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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
स शङ्कमानस्तन्मिथ्या धर्मराजमपृच्छत |  ११४   क
हतं वाप्यहतं वाजौ त्वां पिता पुत्रवत्सलः ||  ११४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति