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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकोपहतचेतसम् |  ११८   क
पाञ्चालराजस्य सुतः क्रूरकर्मा समाद्रवत् ||  ११८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति