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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
तं दृष्ट्वा विहितं मृत्युं लोकतत्त्वविचक्षणः |  ११९   क
दिव्यान्यस्त्राण्यथोत्सृज्य रणे प्राय़ उपाविशत् ||  ११९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति