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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
उद्यम्य वाहू त्वरितो व्रुवाणश्च पुनः पुनः |  १२२   क
जीवन्तमानय़ाचार्यं मा वधीरिति धर्मवित् ||  १२२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति