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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
ततः स्वरथमारोप्य पाञ्चाल्यमरिमर्दनः |  १८   क
अव्रवीदभिसम्प्रेक्ष्य द्रोणमस्यन्तमन्तिकात् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति