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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
तौ न्यवारय़तां श्रेष्ठौ संरव्धौ रणशोभिनौ |  २२   क
उदीरय़ेतां व्राह्माणि दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति