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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
स वसातीञ्शिवींश्चैव वाह्लीकान्कौरवानपि |  २४   क
रक्षिष्यमाणान्सङ्ग्रामे द्रोणं व्यधमदच्युतः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति