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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
इति तत्र महाराज प्राक्रोशद्द्रौणिमेव च |  ३५   क
उत्सृज्य च रणे शस्त्रं रथोपस्थे निवेश्य च |  ३५   ख
अभय़ं सर्वभूतानां प्रददौ योगय़ुक्तवान् ||  ३५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति