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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
वाणपातनिकृत्तास्तु योधास्ते कुरुसत्तम |  ४   क
चेष्टन्तो विविधाश्चेष्टा व्यदृश्यन्त महाहवे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति