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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
द्वौ सूर्याविति नो वुद्धिरासीत्तस्मिंस्तथा गते |  ४०   क
एकाग्रमिव चासीद्धि ज्योतिर्भिः पूरितं नभः |  ४०   ख
समपद्यत चार्काभे भारद्वाजनिशाकरे ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति