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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
अहं धनञ्जय़ः पार्थः कृपः शारद्वतो द्विजः |  ४३   क
वासुदेवश्च वार्ष्णेय़ो धर्मराजश्च पाण्डवः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति