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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
अन्ये तु सर्वे नापश्यन्भारद्वाजस्य धीमतः |  ४४   क
महिमानं महाराज योगमुक्तस्य गच्छतः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति