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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
तस्य मूर्धानमालम्व्य गतसत्त्वस्य देहिनः |  ४७   क
किञ्चिदव्रुवतः काय़ाद्विचकर्तासिना शिरः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति