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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे घोरे देवासुरोपमे |  ५   क
अव्रवीत्क्षत्रिय़ांस्तत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ५   ख
अभिद्रवत संय़त्ताः कुम्भय़ोनिं महारथाः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति