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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नस्तु तद्राजन्भारद्वाजशिरो महत् |  ५४   क
तावकानां महेष्वासः प्रमुखे तत्समाक्षिपत् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति