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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
हते द्रोणे निरुत्साहान्कुरून्पाण्डवसृञ्जय़ाः |  ५८   क
अभ्यद्रवन्महावेगास्ततः सैन्यं व्यदीर्यत ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति