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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
पाण्डवास्तु जय़ं लव्ध्वा परत्र च महद्यशः |  ६२   क
वाणशव्दरवांश्चक्रुः सिंहनादांश्च पुष्कलान् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति