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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
तस्य शव्देन वित्रस्ताः प्राद्रवंस्तावका युधि |  ६६   क
क्षत्रधर्मं समुत्सृज्य पलाय़नपराय़णाः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति