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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
हतप्रवीरैर्भूय़िष्ठं द्विपैर्वहुपदातिभिः |  ७८   क
वृतः शारद्वतोऽगच्छत्कष्टं कष्टमिति व्रुवन् ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति