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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
दर्शनीय़ो युवा चैव शौर्ये च कृतलक्षणः |  ८१   क
दुःशासनो भृशोद्विग्नः प्राद्रवद्गजसंवृतः ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति