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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं ते समाक्रोशन्सैनिका भरतर्षभ |  ८५   क
तिष्ठ तिष्ठेति न च ते स्वय़ं तत्रावतस्थिरे ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति