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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
त्वं चापि न यथापूर्वं प्रकृतिस्थो नराधिप |  ९१   क
कर्णप्रभृतय़श्चेमे नावतिष्ठन्ति पार्थिवाः ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति