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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
भिन्ना नौरिव ते पुत्रो निमग्नः शोकसागरे |  ९५   क
वाष्पेण पिहितो दृष्ट्वा द्रोणपुत्रं रथे स्थितम् ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति