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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
वय़ं द्रोणं पुरस्कृत्य पृथिव्यां प्रवरं रथम् |  ९८   क
प्रावर्तय़ाम सङ्ग्रामं पाञ्चालैरेव केवलैः ||  ९८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति