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आदि पर्व
अध्याय १६६
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गन्धर्व उवाच
स शापात्तस्य विप्रर्षेर्विश्वामित्रस्य चाज्ञय़ा |  १७   क
राक्षसः किङ्करो नाम विवेश नृपतिं तदा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति