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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
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सञ्जय़ उवाच
भल्लभ्यां साधुमुक्ताभ्यां छित्त्वा कर्णस्य कार्मुकम् |  ६६   क
पुनः कर्णं त्रिभिर्वाणैर्वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति