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आदि पर्व
अध्याय १६६
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गन्धर्व उवाच
द्विरनुव्याहृते राज्ञः स शापो वलवानभूत् |  ३३   क
रक्षोवलसमाविष्टो विसञ्ज्ञश्चाभवत्तदा ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति