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वन पर्व
अध्याय १६६
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अर्जुन उवाच
ततो विचार्य वहुधा रथमार्गेषु तान्हय़ान् |  १६   क
प्राचोदय़त्समे देशे मातलिर्भरतर्षभ ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति