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वन पर्व
अध्याय १६६
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अर्जुन उवाच
फेनवत्यः प्रकीर्णाश्च संहताश्च समुच्छ्रिताः |  २   क
ऊर्मय़श्चात्र दृश्यन्ते चलन्त इव पर्वताः |  २   ख
नावः सहस्रशस्तत्र रत्नपूर्णाः समन्ततः ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति