वन पर्व  अध्याय १६६

अर्जुन उवाच

स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषां मम च भारत |  २१   क
अवर्तत महाघोरो निवातकवचान्तकः ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति