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वन पर्व
अध्याय १६६
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अर्जुन उवाच
ततो देवर्षय़श्चैव दानवर्षिगणाश्च ये |  २२   क
व्रह्मर्षय़श्च सिद्धाश्च समाजग्मुर्महामृधे ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति