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वन पर्व
अध्याय १६६
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अर्जुन उवाच
ते वै मामनुरूपाभिर्मधुराभिर्जय़ैषिणः |  २३   क
अस्तुवन्मुनय़ो वाग्भिर्यथेन्द्रं तारकामय़े ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति