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वन पर्व
अध्याय १६६
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अर्जुन उवाच
शङ्खानां च सहस्राणि मग्नान्यप्सु समन्ततः |  ४   क
दृश्यन्ते स्म यथा रात्रौ तारास्तन्वभ्रसंवृताः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति