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विराट पर्व
अध्याय ९
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वैशम्पाय़न उवाच
स प्राप्य राजानममित्रतापन; स्ततोऽव्रवीन्मेघमहौघनिःस्वनः |  ४   क
वैश्योऽस्मि नाम्नाहमरिष्टनेमि; र्गोसङ्ख्य आसं कुरुपुङ्गवानाम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति