द्रोण पर्व  अध्याय १६६

धृतराष्ट्र उवाच

स रथी प्रथमो लोके दृढधन्वा जितक्लमः |  १०   क
शीघ्रोऽनिल इवाक्रन्दे चरन्क्रुद्ध इवान्तकः ||  १०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति