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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
अश्रुपूर्णे ततो नेत्रे अपमृज्य पुनः पुनः |  १८   क
उवाच कोपान्निःश्वस्य दुर्योधनमिदं वचः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति