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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
कामात्क्रोधादवज्ञानाद्दर्पाद्वाल्येन वा पुनः |  २४   क
वैधर्मिकानि कुर्वन्ति तथा परिभवेन च ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति