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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
हा पुत्रकावितृप्तस्य सततं पुत्रदर्शने |  ४१   क
भाग्यहीनस्य कालेन यथा मे नीय़से वलात् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति