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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
यदर्थं पुरुषव्याघ्र पुत्रमिच्छन्ति मानवाः |  ३०   क
प्रेत्य चेह च सम्प्राप्तं त्राणाय़ महतो भय़ात् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति