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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
पित्रा तु मम सावस्था प्राप्ता निर्वन्धुना यथा |  ३१   क
मय़ि शैलप्रतीकाशे पुत्रे शिष्ये च जीवति ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति