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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
यो न जानाति निर्हन्तुं वस्त्राणां रजको मलम् |  २   क
रक्तानि वा शोधय़ितुं यथा नास्ति तथैव सः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति