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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
तान्सर्वाननुवर्तामि दिवारात्रमतन्द्रिता |  ३३   क
विनय़ान्निय़मांश्चापि सदा सर्वात्मना श्रिता ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति