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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
तं स्वय़ं प्रतिगृह्याथ भगवान्स वरं ददौ |  ४४   क
वव्रे पिता मे परममस्त्रं नाराय़णं ततः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति