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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
न त्विदं सहसा व्रह्मन्प्रय़ोक्तव्यं कथञ्चन |  ४६   क
न ह्येतदस्त्रमन्यत्र वधाच्छत्रोर्निवर्तते ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति