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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
न चैतच्छक्यते ज्ञातुं को न वध्येदिति प्रभो |  ४७   क
अवध्यमपि हन्याद्धि तस्मान्नैतत्प्रय़ोजय़ेत् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति