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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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धृतराष्ट्र उवाच
एकमेव हि लोकेऽस्मिन्नात्मनो गुणवत्तरम् |  ५   क
इच्छन्ति पुत्रं पुरुषा लोके नान्यं कथञ्चन ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति