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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
तेनाहं पाण्डवांश्चैव पाञ्चालान्मत्स्यकेकय़ान् |  ५२   क
विद्रावय़िष्यामि रणे शचीपतिरिवासुरान् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति