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विराट पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो रथाभ्यां प्रस्कन्द्य भ्रातरौ क्षत्रिय़र्षभौ |  ५   क
गदापाणी सुसंरव्धौ समभ्यद्रवतां हय़ान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति