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शान्ति पर्व
अध्याय १६७
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भीष्म उवाच
शापश्च सुमहांस्तस्य दत्तः सुरगणैस्तदा |  १७   क
कुक्षौ पुनर्भ्वां भार्याय़ां जनय़ित्वा चिरात्सुतान् |  १७   ख
निरय़ं प्राप्स्यति महत्कृतघ्नोऽय़मिति प्रभो ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति