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शान्ति पर्व
अध्याय १६७
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भीष्म उवाच
मित्रद्रोहो न कर्तव्यः पुरुषेण विशेषतः |  २०   क
मित्रध्रुङ्निरय़ं घोरमनन्तं प्रतिपद्यते ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति